किसी भी रिश्ते की बुनियाद बनाने के लिए तर्क की नहीं समर्पण की आवश्यकता हैं । जिस प्रकार भक्ति में तर्क करने से इश्वर का स्वरुप पत्थर लगाने लगता है ठीक उसी प्रकार रिस्तो में तर्कता की प्रधानता देने पर रिश्ते अपने मौलिकता को खोने के साथ अमानवता का रूप लेने लगते हैं.....
प्रस्तुत ब्लॉग के जरिये मै जन -साधारण तक अपने भावनाओं को संप्रेषित करता चाहता हूँ जिससे समाज में एक नयी धारा का प्रवाह हो सके ...मानव आज के इस अर्थ-प्रधान युग में एवं विकाश की इस अंधी दौड़ में सामाजिक-मूल्यों एवं उनके ओउचित्य को ही भुला बैठा है ....बस मै अपने कविता के माध्यम से उन सामाजिक ,सांस्कृतिक मूल्यों को पुनः शुशोभित करना चाहता हूँ जिससे हमारा समाज ही नहीं अपितु समूचा भारत अपने जिस सभ्यता के लिए विश्व के भौगौलिक पटल पर अपनी छाप को बनाये हुए था वो ठीक उसी प्रकार बनी रहे!
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें